कुमाऊँ और गढ़वाल के बर्फ़ीले ट्रेक एक साथ, नैनीताल के ऊपर सुबह की सैर से लेकर कुआरी पास के पाँच दिनों तक, दिनों, ऊँचाई, सबसे पास के स्टेशन और इस सर्दी लागू नियमों के साथ।
छोटा जवाब: उत्तराखंड के शीतकालीन ट्रेक दिसंबर से फ़रवरी तक चलते हैं, कुछ मार्च तक, और जाने-माने बर्फ़ीले ट्रेक गढ़वाल में हैं: केदारकांठा, ब्रह्मताल, कुआरी पास, दयारा बुग्याल और चंद्रशिला के साथ तुंगनाथ, हर एक घर से लौटने तक पाँच या छह दिन का, और सबसे ऊँचा बिंदु करीब 3,600 से 3,875 मीटर के बीच। नाग टिब्बा देहरादून से दो-तीन दिन का आसान विकल्प है। काठगोदाम से पहुँच में आने वाला बर्फ़ीला ट्रेक ब्रह्मताल है, जिसका सड़क वाला आख़िरी पड़ाव लोहाजंग करीब 200 से 220 किमी दूर है, जबकि कुमाऊँ में ख़ुद छोटी शीतकालीन पैदल यात्राएँ हैं: नैनीताल के ऊपर नैना पीक, बिनसर ज़ीरो पॉइंट और, फ़िट लोगों के लिए, मुनस्यारी के ऊपर खलिया टॉप। सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई 2026 को ऊँचे बुग्यालों में रात को रुकने पर लगी रोक हटा दी, और 16 अक्टूबर को हमारी जाँच तक राज्य की नई ट्रेकिंग नियमावली अभी मसौदा ही थी।
कौन-सा शीतकालीन ट्रेक आपके लिए ठीक है, यह चार बातें तय करती हैं, और ट्रेक का नाम उनमें सबसे कम मायने रखता है। पहली बात है ऊँचाई। उत्तराखंड में बर्फ़ ज़्यादातर करीब 2,000 मीटर से ऊपर टिकती है और भरोसे के साथ उससे भी ऊपर, इसलिए 3,000 मीटर के आसपास ख़त्म होने वाला ट्रेक सूखी जनवरी में बिना बर्फ़ के रह सकता है, जबकि 3,800 मीटर के आसपास वाला लगभग हमेशा सफ़ेद रहता है। पिछली तीन सर्दियों का तारीख़ वाला रिकॉर्ड हमारी उत्तराखंड में बर्फ़ कहाँ गिरती है, इस पर गाइड में है।
दूसरी बात है दिन। गढ़वाल के बर्फ़ीले ट्रेक पाँच या छह दिन के बताकर बेचे जाते हैं, पर उनमें से तीन या चार दिन ही पैदल चलना होता है; बाक़ी समय आने-जाने की ड्राइव में जाता है, जो देहरादून या ऋषिकेश से हर तरफ़ आठ से ग्यारह घंटे की होती है। लंबे सप्ताहांत में सिर्फ़ नाग टिब्बा या कुमाऊँ की कोई पैदल यात्रा समाती है। तीसरी बात है कठिनाई, और यहाँ ट्रेक कराने वाली कंपनियाँ इस पेज के हर ट्रेक को “आसान” से “मध्यम” के बीच रखती हैं। सर्दियों में इनमें से कोई भी आसान नहीं है: दिन छोटे होते हैं, सुबह रास्ते जमे होते हैं और रातें शून्य से काफ़ी नीचे।
चौथी बात है आपकी ट्रेन कहाँ रुकती है। कुमाऊँ का स्टेशन काठगोदाम है, हल्द्वानी से 5 किमी ऊपर; गढ़वाल के स्टेशन देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश हैं। ज़्यादातर मशहूर शीतकालीन ट्रेक गढ़वाल के स्टेशनों के पास से शुरू होते हैं, इसलिए केदारकांठा के लिए काठगोदाम का टिकट लेने से पहले यह जान लेना अच्छा है। ब्रह्मताल अपवाद है, जहाँ दोनों तरफ़ से पहुँचा जा सकता है।
| ट्रेक | कहाँ से शुरू | सबसे पास का स्टेशन | दिन | सबसे ऊँचा बिंदु | बर्फ़ के महीने | कितना कठिन |
|---|---|---|---|---|---|---|
| नैना पीक (नैनीताल) | स्नो व्यू या बारापत्थर | काठगोदाम | आधा दिन | 2,611 मीटर | दिसंबर से फ़रवरी, कुछ दिन | आसान सैर, बर्फ़ के बाद फिसलन |
| बिनसर ज़ीरो पॉइंट (अल्मोड़ा) | बिनसर अभयारण्य के अंदर | काठगोदाम | एक-दो घंटे | करीब 2,400 मीटर | कुछ सर्दियों में | आसान, 2 किमी |
| खलिया टॉप (मुनस्यारी) | बलाती बैंड | काठगोदाम | एक लंबा दिन | करीब 3,500 मीटर | दिसंबर से मार्च | खड़ी चढ़ाई, गहरी बर्फ़ में कठिन |
| नाग टिब्बा | पंतवाड़ी, टिहरी गढ़वाल | देहरादून | 2 से 3 | करीब 3,020 मीटर | दिसंबर से मार्च | आसान |
| केदारकांठा | सांकरी या कोटगांव, उत्तरकाशी | देहरादून | 5 से 6 | करीब 3,800 मीटर | दिसंबर से फ़रवरी | आसान से मध्यम |
| दयारा बुग्याल | रैथल या बारसू, उत्तरकाशी | देहरादून | 5 से 6 | करीब 3,600 से 3,750 मीटर | दिसंबर से मार्च | आसान से मध्यम |
| ब्रह्मताल | लोहाजंग, चमोली | काठगोदाम या ऋषिकेश | 6 | करीब 3,730 से 3,850 मीटर | दिसंबर से फ़रवरी | आसान से मध्यम |
| तुंगनाथ और चंद्रशिला | चोपता या सारी, रुद्रप्रयाग | हरिद्वार या ऋषिकेश | 1 से 5 | करीब 3,680 मीटर | दिसंबर से फ़रवरी | आसान से मध्यम |
| कुआरी पास | ढाक या करछी, ज्योतिर्मठ के पास | हरिद्वार या ऋषिकेश | 5 से 6 | करीब 3,815 से 3,875 मीटर | दिसंबर से मार्च | मध्यम |
नैना पीक और बिनसर की ऊँचाई नैनीताल ज़िले और भारत सरकार की पर्यटन वेबसाइट से है। गढ़वाल के ट्रेक के दिन, दूरी, कठिनाई और ऊँचाई उन कार्यक्रमों से हैं जो कम से कम दो ट्रेक कंपनियाँ सर्दी 2026-27 के लिए प्रकाशित करती हैं; इनमें आपस में फ़र्क़ है, इसलिए हमने दायरा दिया है। “दिन” में स्टेशन वाले सबसे पास के शहर से जाने और लौटने तक का पूरा समय गिना गया है, ड्राइव के दिन भी।
कुमाऊँ में कई दिनों वाला वैसा बर्फ़ीला ट्रेक नहीं है जिसके लिए गढ़वाल जाना जाता है, और ईमानदारी से बात यहीं से शुरू होती है। यहाँ जो है, वे ऐसी शीतकालीन पैदल यात्राएँ हैं जो हल्द्वानी से एक घंटे या एक दिन की दूरी पर शुरू होती हैं और ज़्यादातर सर्दियों में असली बर्फ़ तक पहुँचती हैं, बिना कैंप लगाए।
नैना पीक, जिसे चाइना पीक भी कहते हैं, ज़िले के आँकड़े के अनुसार 2,611 मीटर पर नैनीताल के ऊपर का सबसे ऊँचा बिंदु है, और स्नो व्यू या बारापत्थर से 6 किमी पैदल या घोड़े पर। पिछली तीनों सर्दियों में यहाँ बर्फ़ पहुँची, सबसे हाल में 23 जनवरी 2026 को। जून 2026 से वन विभाग इस ट्रेक पर रोज़ 150 लोगों को 50 रुपये प्रति व्यक्ति पर जाने देता है, इसलिए बर्फ़ वाली सुबह जल्दी पहुँचिए। टिफिन टॉप (2,292 मीटर) छोटी सैर है, शहर से करीब 4 किमी, पर ऊपर की पुरानी बेंच डोरोथी सीट 6 अगस्त 2024 की रात भूस्खलन में ढह गई। नैनीताल से 12 किमी दूर किलबरी (2,194 मीटर) और उसके आगे पंगोट जंगल की शांत सैर हैं और पक्षियों के लिए अच्छी; 12 जनवरी 2025 को इन तक की सड़क से बर्फ़ जेसीबी से हटानी पड़ी। महीने-दर-महीने संभावना हमारी नैनीताल में बर्फबारी की गाइड में है।
बिनसर वन्यजीव अभयारण्य अल्मोड़ा से करीब 30 किमी आगे है, और अल्मोड़ा हल्द्वानी से 87 किमी, इसलिए यह एक लंबा दिन है या, बेहतर, अभयारण्य के अंदर एक रात। ज़ीरो पॉइंट, करीब 2,400 मीटर पर अभयारण्य का सबसे ऊँचा व्यू पॉइंट, 2 किमी पैदल है, और साफ़ सर्दी की सुबह वहाँ से सामने बर्फ़ीली चोटियों की कतार दिखती है। ज़िला अक्टूबर से मार्च को सबसे अच्छा मौसम बताता है। बिनसर में बर्फ़ मुक्तेश्वर से कम पक्की है: पिछली तीन सर्दियों में यहाँ सिर्फ़ जनवरी 2026 में बर्फ़ गिरी। रास्ते की जानकारी हमारी हल्द्वानी से अल्मोड़ा गाइड में है।
खलिया टॉप कुमाऊँ की वह एक असली बर्फ़ीली चढ़ाई है जो सर्दियों में घूमने आए लोग करते हैं। रास्ता मुनस्यारी आने वाली सड़क पर बलाती बैंड से शुरू होता है और जंगल से होते हुए करीब 6 किमी चढ़कर करीब 3,500 मीटर पर पंचाचूली चोटियों के सामने एक बुग्याल तक पहुँचता है; आना-जाना लगभग पूरा दिन लेता है। यहाँ हर सर्दी भारी बर्फ़ गिरती है: अमर उजाला के अनुसार 5 फ़रवरी 2024 को ढाई फुट, और 20 मार्च 2026 को भी तीन इंच। यही गहराई ख़तरा है। 5 फ़रवरी 2026 को पर्यटकों का एक दल खलिया में रास्ता भटक गया और पुलिस उन्हें देर रात ढाई से तीन फुट बर्फ़ के बीच से नीचे लाई; उसी ख़बर में बताया गया कि ऊपर अक्सर फ़ोन का सिग्नल नहीं मिलता। स्थानीय गाइड के साथ जाइए, जल्दी निकलिए और दोपहर ढलने से पहले लौटना शुरू कीजिए। मुनस्यारी हल्द्वानी से करीब 280 किमी और दस से ग्यारह घंटे दूर है, इसलिए कम से कम दो रातें रखिए।
लोग अक्सर सर्दियों की यात्रा के लिए बागेश्वर ज़िले के पिंडारी, कफनी और सुंदरढूंगा, या दारमा घाटी में पंचाचूली बेस कैंप के बारे में पूछते हैं। ये शरद और वसंत के ट्रेक हैं। वन विभाग बागेश्वर के ग्लेशियर वाले रास्ते मानसून में 15 जून से 15 सितंबर तक बंद रखता है, और ट्रेकिंग के लिए अप्रैल से जुलाई और सितंबर से अक्टूबर के महीने बताता है; वह खाती और हिचौड़ी की चौकियों पर हर ट्रेकर का पंजीकरण करता है। 8 अक्टूबर 2025 को जब पिंडारी के पास पहली बर्फ़ गिरी, तो ज़िलाधिकारी ने आगे की अनुमति रोक दी। पंचाचूली के रास्ते के दारमा के गाँव अप्रैल से अक्टूबर तक बसे रहते हैं और सर्दियों में ख़ाली हो जाते हैं। अल्मोड़ा ज़िला दो और पैदल रास्ते, दूनागिरि से पांडुखोली और बिनसर से जागेश्वर, भी गिनाता है, पर उनके रास्ते का कोई ब्योरा प्रकाशित नहीं करता।
“उत्तराखंड के शीतकालीन ट्रेक” कहने पर ज़्यादातर लोगों के मन में यही ट्रेक होते हैं। ये सभी कई कंपनियाँ तय तारीख़ों वाले समूहों में बेचती हैं, जिनमें गाइड, टेंट और खाना शामिल होता है, और ज़्यादातर ट्रेकर इसी तरह जाते हैं। यहाँ इन्हें काठगोदाम से सबसे पास वाले से लेकर सबसे दूर वाले के क्रम में रखा गया है।
ब्रह्मताल चमोली ज़िले के लोहाजंग से शुरू होता है और चार दिन में एक जमी झील और करीब 3,730 से 3,850 मीटर की धार तक चढ़ता है, कुल करीब 22 से 28 किमी। यही वह बर्फ़ीला ट्रेक है जो काठगोदाम के टिकट से मेल खाता है। लोहाजंग की सड़क अल्मोड़ा, ग्वालदम और देवाल होकर जाती है, करीब 200 से 220 किमी, और साझा जीपें सुबह जल्दी काठगोदाम स्टेशन के बाहर से निकलती हैं, पूरे दिन की ड्राइव के लिए; ऋषिकेश से यह करीब 270 किमी और दस से ग्यारह घंटे है। कंपनियाँ इसे दिसंबर से फ़रवरी और वसंत तक चलाती हैं, पर चेताती हैं कि सबसे भारी बर्फ़ में झील और चोटी तक पहुँचना मुमकिन न हो, और बड़ी बर्फबारी के बाद लोहाजंग की सड़क ख़ुद एक-दो दिन बंद रह सकती है।
कुआरी पास को इस समूह में सबसे कठिन माना जाता है और साफ़ दिन में इसका नज़ारा सबसे चौड़ा है, जिसमें दूनागिरि, कामेट, चौखंबा और हाथी पर्वत एक साथ दिखते हैं। ट्रेक ज्योतिर्मठ (2024 तक इस शहर का नाम जोशीमठ था) से करीब 16 किमी दूर ढाक या करछी से शुरू होता है, नंदा देवी बायोस्फ़ीयर रिज़र्व के बुग्यालों को पार करके करीब 3,815 से 3,875 मीटर के दर्रे तक जाता है, और आमतौर पर औली उतरता है; पाँच या छह दिन, 22 से 30 किमी। ऋषिकेश से ढाक करीब 255 किमी और नौ से दस घंटे है। बर्फ़ दिसंबर से मार्च के आख़िर तक रहती है, और जब गोरसों बुग्याल पार करने लायक़ न रहे, तो कंपनियाँ रास्ता बदल देती हैं। एक कंपनी शुरुआत से पहले ज्योतिर्मठ के सरकारी अस्पताल में मेडिकल जाँच भी माँगती है। औली की सड़क ही बर्फ़ से सबसे ज़्यादा बंद होती है: चमोली पुलिस ने 24 जनवरी 2026 को इसे साफ़ होने तक बंद रखा, और जनवरी 2025 और 2026 में टीवी टावर वाले मोड़ से आगे सिर्फ़ फ़ोर-व्हील-ड्राइव गाड़ियों को जाने दिया गया।
रुद्रप्रयाग ज़िले के चोपता से पंच केदार के सबसे ऊँचे मंदिर तुंगनाथ तक पत्थर का रास्ता करीब 3 किमी है, और चंद्रशिला उससे 1.5 किमी आगे और करीब 180 मीटर ऊपर, लगभग 3,680 मीटर पर है। चोपता से यह एक लंबे दिन का काम है; कंपनियाँ सारी गाँव से पाँच दिन का घेरा बेचती हैं जिसमें देवरिया ताल भी जुड़ता है। ऋषिकेश से सारी करीब 190 किमी और सात से आठ घंटे है। सर्दी दो दिक़्क़तें लाती है। मंदिर नवंबर की शुरुआत में बंद होता है, 2025 में 6 नवंबर को, और उसके देवता सर्दियाँ मक्कूमठ में बिताते हैं; 12 जनवरी 2026 को दुगलबिट्टा में हुई बैठक में स्थानीय प्रशासन ने तय किया कि कपाट बंद होने के बाद सर्दियों में पर्यटकों को तुंगनाथ तक नहीं जाने दिया जाएगा, और चंद्रशिला के लिए नया रास्ता बनाने की योजना बनेगी। इस सर्दी के लिए नया रास्ता तैयार होने की कोई ख़बर हमें नहीं मिली, इसलिए जाने से पहले चोपता में पूछ लीजिए। दूसरी दिक़्क़त सड़क है: 23 और 24 जनवरी 2026 को बर्फ़ ने चोपता की उखीमठ और मंडल वाली दोनों सड़कें रोक दीं और सैकड़ों पर्यटक फँसे रहे। बुग्यालों पर रास्ते से हटकर चलने पर जुर्माना भी लगता है; ईटीवी भारत के अनुसार जुलाई 2025 में इस रास्ते पर 102 पर्यटकों पर वन अधिनियम के तहत जुर्माना लगा। मंदिर बंद रहने के दौरान केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की पूजा कहाँ होती है, यह हमारी शीतकालीन चारधाम यात्रा गाइड में है।
केदारकांठा वह ट्रेक है जिसे पहली बार जाने वाले ज़्यादातर लोग चुनते हैं, और दिसंबर के बीच से जनवरी के बीच तक सांकरी के ऊपर के कैंप यही दिखाते हैं। यह उत्तरकाशी ज़िले के मोरी इलाक़े में सांकरी से, या 5 किमी आगे कोटगांव से, गोविंद पशु विहार के अंदर शुरू होता है; रास्ते में नैटवाड़ बैरियर पर ट्रेकर सरकारी पहचान पत्र दिखाकर अनुमति लेते हैं। चोटी करीब 3,800 मीटर पर है और रास्ता चार दिन के पैदल सफ़र में करीब 22 से 23 किमी, घर से लौटने तक छह दिन। देहरादून से सांकरी करीब 195 किमी और आठ से नौ घंटे है, और लौटने की ड्राइव अक्सर इससे लंबी होती है। यह पूरी सर्दी चलता है और जनवरी 2027 के हर हफ़्ते की तारीख़ें निकली हुई हैं, पर बर्फ़ की गारंटी नहीं: 2025-26 की सूखी शुरुआत में कंपनियों ने जनवरी की शुरुआत में रास्ते पर बस थोड़ी-सी बर्फ़ बताई, और पूरे राज्य में पहली भारी बर्फबारी 23 जनवरी 2026 को हुई।
दयारा उत्तरकाशी ज़िले में भागीरथी घाटी के ऊपर एक चौड़ा बुग्याल है, जहाँ रैथल या बारसू से पहुँचा जाता है। इसका सबसे ऊँचा बिंदु करीब 3,600 से 3,750 मीटर पर है और ट्रेक पाँच या छह दिन में करीब 21 से 24 किमी का है। देहरादून से रैथल करीब 185 से 200 किमी और आठ से नौ घंटे है, और उत्तरकाशी का ज़िला अस्पताल सड़क के आख़िरी पड़ाव से करीब एक घंटे नीचे है। दयारा एक बुग्याल, यानी ऊँचा घास का मैदान है, और बुग्यालों में कैंप के नियम इस साल बदले हैं; नीचे नियम देखिए।
नाग टिब्बा छोटा ट्रेक है: टिहरी गढ़वाल के पंतवाड़ी से दो या तीन दिन, कुल करीब 16 से 20 किमी, करीब 3,020 मीटर की चोटी तक। पंतवाड़ी देहरादून से करीब 90 किमी और तीन से चार घंटे दूर है, इसलिए इस पेज पर यही अकेला बर्फ़ीला ट्रेक है जो लंबे सप्ताहांत में समा जाता है। सबसे नीचा होने के कारण सूखी जनवरी में इसी के बिना बर्फ़ रहने की संभावना सबसे ज़्यादा है।
ऊँचे बुग्यालों में कैंप फिर से हो सकता है। अगस्त 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुग्यालों में रात को रुकने पर रोक लगाई थी और हर बुग्याल में रोज़ 200 लोगों की सीमा तय की थी। 20 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ये दोनों निर्देश रद्द कर दिए, साथ में बुग्यालों को राष्ट्रीय उद्यान बनाने का प्रस्ताव भी, और आदेश का बाक़ी हिस्सा बनाए रखा: कोई पक्का ढाँचा नहीं, कूड़ा वापस लाना, चराई पर सीमा। बद्रीनाथ वन प्रभाग ने 27 जुलाई को अपने रेंज अधिकारियों को यह बदलाव लागू करने के लिए लिखा। कुआरी पास, दयारा और ब्रह्मताल के लिए इसका मतलब है कि बुग्यालों पर या उनके पास कैंप फिर से संभव होने चाहिए, वन विभाग की शर्तों के साथ; अपनी कंपनी से पूछ लीजिए कि उसके कैंप कहाँ होंगे।
राज्य की ट्रेकिंग नियमावली अभी मसौदा है। जून 2024 में सहस्त्रताल के पास बर्फ़ीले तूफ़ान में कर्नाटक के नौ ट्रेकरों की मौत के बाद पर्यटन और वन विभाग ने उत्तराखंड ट्रेकिंग नियमावली 2026 का मसौदा बनाया। जनवरी 2026 में ईटीवी भारत की ख़बर के अनुसार, इसके तहत हर ट्रेकिंग एजेंसी का पंजीकरण होगा, ट्रेकरों को मेडिकल प्रमाणपत्र और बीमा साथ रखना होगा, एजेंसियों को हर ट्रेक से पहले मौसम जाँचना होगा और मौसम बिगड़ने पर ट्रेक रोकना होगा, और नियम तोड़ने पर 10,000 रुपये तक जुर्माना लगेगा। जुलाई में मुख्य सचिव ने इसे अगस्त में कैबिनेट के सामने रखने को कहा; 16 अक्टूबर 2026 तक इसकी मंज़ूरी की कोई ख़बर हमें नहीं मिली, इसलिए इसमें से कुछ भी अभी लागू नहीं है।
वन अनुमति और शुल्क। केदारकांठा गोविंद पशु विहार में है, तुंगनाथ और चंद्रशिला केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य में और कुआरी पास नंदा देवी बायोस्फ़ीयर रिज़र्व में, और इन रास्तों पर वन विभाग अपनी चौकी पर प्रवेश या कैंपिंग शुल्क लेता है, जो विदेशी नागरिकों के लिए ज़्यादा है। गढ़वाल के किसी भी ट्रेक के लिए हमें शुल्क की कोई सरकारी सूची नहीं मिली, और ऑनलाइन बताए जाने वाले आँकड़ों में बहुत फ़र्क़ है, इसलिए हम कोई रक़म नहीं छाप रहे; कंपनियाँ इसे आमतौर पर पैकेज में शामिल रखती हैं। कुमाऊँ में नैना पीक का शुल्क 50 रुपये है, रोज़ 150 लोगों की सीमा के साथ। पिथौरागढ़ ज़िले ने मई 2026 से अपने ऊँचे रास्तों, जैसे मिलम, रालम, दारमा और पंचाचूली, पर हर ट्रेकर के लिए ज़िला पर्यटन कार्यालय में ईमेल से पहले पंजीकरण ज़रूरी किया है, जिसमें नाम, पता, मोबाइल नंबर, उम्र और आधार देना होता है।
मैदानों से इन ट्रेक की ठंड का अंदाज़ा कम लगता है। IMD के 1991-2020 के सामान्य आँकड़ों के अनुसार 2,286 मीटर पर मुक्तेश्वर में जनवरी का औसत न्यूनतम तापमान 1.7 °C है, और हर 1,000 मीटर ऊपर चढ़ने पर हवा करीब 6.5 °C ठंडी हो जाती है। इस हिसाब से जनवरी की औसत रात 3,300 मीटर के कैंप में करीब शून्य से 5 °C नीचे और 3,800 मीटर की चोटी पर करीब शून्य से 8 °C नीचे रहती है, हवा जोड़े बिना। ताज़ा बर्फ़ के बाद की साफ़ रात इससे भी ठंडी होती है।
ऐसी परतों में कपड़े पहनिए जिन्हें चढ़ते समय उतार सकें और रुकने पर फिर पहन सकें: थर्मल की भीतरी परत, फ़्लीस, डाउन या सिंथेटिक जैकेट और हवा व पानी रोकने वाली ऊपरी परत, साथ में गर्म टोपी, वाटरप्रूफ़ दस्तानों के अंदर पतले दस्ताने, और ऊनी मोज़ों के दो जोड़े। गहरी पकड़ वाले अच्छे ट्रेकिंग जूते किसी भी चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी हैं; कई कंपनियाँ बर्फ़ वाले दिनों के लिए माइक्रोस्पाइक और गेटर देती हैं, इसलिए अपनी कंपनी से पूछ लीजिए। धूप का चश्मा रखिए, क्योंकि इस ऊँचाई पर बर्फ़ की चमक आँखें जला देती है, और सनस्क्रीन भी। पानी की बोतलें रात में जम जाती हैं, जब तक वे आपके स्लीपिंग बैग में न सोएँ।
ट्रेन से आ रहे हैं तो स्टेशन ट्रेक के हिसाब से चुनिए। काठगोदाम नैना पीक, बिनसर, खलिया टॉप और ब्रह्मताल के लिए ठीक है। दिल्ली से रात की रानीखेत एक्सप्रेस सुबह जल्दी यहाँ पहुँचती है और शताब्दी दोपहर से पहले; मौजूदा समय रेलवे की पूछताछ वेबसाइट पर देख लीजिए, क्योंकि दिसंबर और जनवरी में मैदानों का कोहरा रात की ट्रेनों को लेट करता है और कुछ सेवाएँ मौसम भर के लिए घटा दी जाती हैं। पिछली सर्दी में रद्द हुई ट्रेनों की सूची हमारी उत्तराखंड में सर्दियों की गाइड में है। दिल्ली की तीनों ट्रेनें, उनका समय और कोहरे में वे कितनी लेट चलती हैं, यह हमारी दिल्ली से काठगोदाम ट्रेन की गाइड में है। देर से पहुँचें तो काठगोदाम स्टेशन के पास के होटल सबसे क़रीब हैं, और भोर में निकलने के लिए पहली साझा जीप का इंतज़ार करने से हल्द्वानी से कैब आसान है।
देहरादून केदारकांठा, दयारा और नाग टिब्बा का स्टेशन है, और हरिद्वार या ऋषिकेश तुंगनाथ, चंद्रशिला और कुआरी पास के। ज़्यादातर कंपनियाँ अपने समूहों को सुबह जल्दी देहरादून या ऋषिकेश से लेती हैं, यानी आमतौर पर एक शाम पहले पहुँचना होता है। हल्द्वानी से लोहाजंग को छोड़कर गढ़वाल की हर शुरुआती जगह राज्य के आर-पार एक लंबे दिन की ड्राइव है, इसलिए कुमाऊँ की यात्रा और गढ़वाल का ट्रेक दो अलग छुट्टियों के तौर पर प्लान करना बेहतर है।
जो भी चुनें, मौसम के लिए आगे-पीछे एक-एक दिन रखिए। बर्फ़ रास्तों से पहले सड़कें बंद करती है, और अक्टूबर में बुक किया गया ट्रेक उसी बर्फबारी से बंद सड़क से टकरा सकता है जिसके लिए आप आए थे। ज़िलों की बंद सड़कें राज्य लोक निर्माण विभाग के रोड क्लोज़र पेज पर आती हैं, और पूरे राज्य में आपात नंबर 112 है।
टिहरी गढ़वाल में पंतवाड़ी के ऊपर नाग टिब्बा रात रुकने वाला सबसे आसान बर्फ़ीला ट्रेक है: दो या तीन दिन, कुल करीब 16 से 20 किमी, करीब 3,020 मीटर की चोटी तक, और पंतवाड़ी देहरादून से करीब 90 किमी है। हल्द्वानी में ठहरकर सबसे आसान बर्फ़ीली सैर नैनीताल के ऊपर 2,611 मीटर की नैना पीक है, स्नो व्यू या बारापत्थर से 6 किमी पैदल। लंबे ट्रेक में केदारकांठा, दयारा बुग्याल और ब्रह्मताल को आसान से मध्यम माना जाता है।
हाँ। केदारकांठा पूरी सर्दी, दिसंबर से फ़रवरी तक, चलता है और कंपनियाँ जनवरी के हर हफ़्ते की तारीख़ें देती हैं; यह सिर्फ़ मानसून में बंद रहता है। बर्फ़ की गारंटी नहीं है: 2025-26 में जनवरी की शुरुआत में रास्ते पर बस थोड़ी-सी बर्फ़ थी, और पहली भारी बर्फबारी 23 जनवरी को हुई। दिसंबर के बीच से जनवरी के बीच तक सांकरी की तरफ़ सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है।
एक दिन की सैर के लिए नैनीताल के ऊपर नैना पीक, जो काठगोदाम से करीब 40 किमी है। कई दिनों के बर्फ़ीले ट्रेक के लिए ब्रह्मताल: इसकी शुरुआत चमोली का लोहाजंग काठगोदाम से अल्मोड़ा, ग्वालदम और देवाल होकर करीब 200 से 220 किमी है, और साझा जीपें सुबह जल्दी काठगोदाम स्टेशन के बाहर से निकलती हैं। मुनस्यारी के ऊपर खलिया टॉप काठगोदाम से करीब 300 किमी है।
पूरे राज्य के लिए एक ट्रेक अनुमति अभी नहीं है; 16 अक्टूबर 2026 तक राज्य की ट्रेकिंग नियमावली मसौदा ही थी। संरक्षित इलाक़ों के अंदर के ट्रेक, जैसे गोविंद पशु विहार में केदारकांठा और केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य में तुंगनाथ और चंद्रशिला, के लिए चौकी पर वन अनुमति और शुल्क लगता है, जिसका इंतज़ाम आमतौर पर कंपनियाँ करती हैं। पिथौरागढ़ ज़िला अपने ऊँचे रास्तों के लिए ईमेल से पहले पंजीकरण माँगता है, और नैना पीक पर रोज़ 150 लोग 50 रुपये प्रति व्यक्ति पर जा सकते हैं।
ज़्यादातर लोग जितना सामान रखते हैं, उससे ज़्यादा। IMD के 1991-2020 के सामान्य आँकड़ों के अनुसार 2,286 मीटर पर मुक्तेश्वर में जनवरी का औसत न्यूनतम तापमान 1.7 °C है, और हर 1,000 मीटर पर हवा करीब 6.5 °C ठंडी होती है, इसलिए जनवरी की औसत रात 3,300 मीटर के कैंप में करीब शून्य से 5 °C नीचे और 3,800 मीटर पर करीब शून्य से 8 °C नीचे रहती है, हवा जोड़े बिना। कई पतली परतें, डाउन जैकेट, वाटरप्रूफ़ दस्ताने और ऊनी मोज़े रखिए।